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February 13, 2010

"जान भर रहे हैं जंगल में" - बाबा नागार्जुन

"जान भर रहे हैं जंगल में"
गीली भादों
रैन अमावस

कैसे ये नीलम उजास के
अच्छत छींट रहे जंगल में
कितना अद्भुत योगदान है
इनका भी वर्षा-मंगल में
लगता है ये ही जीतेंगे
शक्ति प्रदर्शन के दंगल में
लाख-लाख हैं, सौ हज़ार हैं
कौन गिनेगा, बेशुमार हैं
मिल-जुलकर दिप-दिप करते हैं
कौन कहेगा, जल मरते हैं
जान भर रहे हैं जंगल में

जुगनू है ये स्वयं प्रकाशी
पल-पल भास्वर पल-पल नाशी
कैसा अद्भुत योगदान है
इनका भी वर्षा मंगल में
इनकी विजय सुनिश्चित ही है
तिमिर तीर्थ वाले दंगल में
इन्हें न तुम 'बेचारे' कहना
अजी यही तो ज्योति-कीट हैं
जान भर रहे हैं जंगल में

गीली भादों
रैन अमावस

[ रचनाकार: - बाबा नागार्जुन ]

February 12, 2010

"गुपचुप हजम करोगे" - बाबा नागार्जुन

"गुपचुप हजम करोगे"
कच्ची हजम करोगे
पक्की हजम करोगे
चूल्हा हजम करोगे
चक्की हजम करोगे

बोफ़ोर्स की दलाली
गुपचुप हजम करोगे
नित राजघाट जाकर
बापू-भजन करोगे
वरदान भी मिलेगा
जयगान भी मिलेगा
चाटोगे फैक्स फेयर
दिल के कमल खिलेंगे
फोटे के हित उधारी
मुस्कान रोज दोगे
सौ गालियाँ सुनोगे
तब एक भोज दोगे
फिर संसदें जुड़ेंगी
फिर से करोगे वादे
दीखोगे नित नए तुम
उजली हँसी में सादे
बोफ़ोर्स की दलाली
गुपचुप हजम करोगे
नित राजघाट जाकर
बापू-भजन करोगे
[ रचनाकार: - बाबा नागार्जुन ]

February 7, 2010

"जी हाँ, लिख रहा हूँ " - बाबा नागार्जुन

"जी हाँ, लिख रहा हूँ "
जी हाँ, लिख रहा हूँ ...
बहुत कुछ ! बहोत बहोत !!
ढेर ढेर सा लिख रहा हूँ !
मगर , आप उसे पढ़ नहीं
पाओगे ... देख नहीं सकोगे
उसे आप !

दरअसल बात यह है कि
इन दिनों अपनी लिखावट
आप भी मैं कहॉ पढ़ पाता हूँ
नियोन-राड पर उभरती पंक्तियों की
तरह वो अगले ही क्षण
गुम हो जाती हैं
चेतना के 'की-बोर्ड' पर वो बस
दो-चार सेकेंड तक ही
टिकती है ....
कभी-कभार ही अपनी इस
लिखावट को कागज़ पर
नोट कर पता हूँ
स्पन्दनशील संवेदन की
क्षण-भंगुर लड़ियाँ
सहेजकर उन्हें और तक
पहुँचाना !
बाप रे , कितना मुश्किल है !
आप तो 'फोर-फिगर' मासिक -
वेतन वाले उच्च-अधिकारी ठहरे,
मन-ही-मन तो हसोंगे ही,
की भला यह भी कोई
काम हुआ , की अनाप-
शनाप ख़यालों की
महीन लफ्फाजी ही
करता चले कोई -
यह भी कोई काम हुआ भला !

[ रचनाकार: - बाबा नागार्जुन ]

February 5, 2010

"घिन तो नहीं आती है" - बाबा नागार्जुन

"घिन तो नहीं आती है"
पूरी स्पीड में है ट्राम
खाती है दचके पै दचके
सटता है बदन से बदन
पसीने से लथपथ ।
छूती है निगाहों को
कत्थई दांतों की मोटी मुस्कान
बेतरतीब मूँछों की थिरकन
सच सच बतलाओ
घिन तो नहीं आती है ?
जी तो नहीं कढता है ?

कुली मज़दूर हैं
बोझा ढोते हैं , खींचते हैं ठेला
धूल धुआँ भाप से पड़ता है साबका
थके मांदे जहाँ तहाँ हो जाते हैं ढेर
सपने में भी सुनते हैं धरती की धड़कन
आकर ट्राम के अन्दर पिछले डब्बे मैं
बैठ गए हैं इधर उधर तुमसे सट कर
आपस मैं उनकी बतकही
सच सच बतलाओ
जी तो नहीं कढ़ता है ?
घिन तो नहीं आती है ?

दूध-सा धुला सादा लिबास है तुम्हारा
निकले हो शायद चौरंगी की हवा खाने
बैठना है पंखे के नीचे , अगले डिब्बे मैं
ये तो बस इसी तरह
लगाएंगे ठहाके, सुरती फाँकेंगे
भरे मुँह बातें करेंगे अपने देस कोस की
सच सच बतलाओ
अखरती तो नहीं इनकी सोहबत ?
जी तो नहीं कुढता है ?
घिन तो नहीं आती है ?

[ रचनाकार: - बाबा नागार्जुन ]

February 2, 2010

"अकाल और उसके बाद " - बाबा नागार्जुन

"अकाल और उसके बाद "
कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त ।


दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद
धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद
चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद
कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद ।

[ रचनाकार: - बाबा नागार्जुन ]

January 31, 2010

"हाय, अलीगढ़ !" - बाबा नागार्जुन

"हाय, अलीगढ़ !"
हाय, अलीगढ़!
हाय, अलीगढ़!
बोल, बोल, तू ये कैसे दंगे हैं
हाय, अलीगढ़!
हाय, अलीगढ़!
शान्ति चाहते, सभी रहम के भिखमंगे हैं
सच बतलाऊँ?
मुझको तो लगता है, प्यारे,
हुए इकट्ठे इत्तिफ़ाक से, सारे हो नंगे हैं
सच बतलाऊँ?
तेरे उर के दुख-दरपन में
हुए उजागर
सब कोढ़ी-भिखमंगे हैं
फ़िकर पड़ी, बस, अपनी-अपनी
बड़े बोल हैं
ढमक ढोल हैं
पाँच स्वार्थ हैं पाँच दलों के
हदें न दिखतीं कुटिल चालाकी
ओर-छोर दिखते न छलों के
बत्तिस-चौंसठ मनसूबे हैं आठ दलों के

[ रचनाकार: - बाबा नागार्जुन ]

January 25, 2010

"सत्य" - बाबा नागार्जुन

"सत्य"
सत्य को लकवा मार गया है
वह लंबे काठ की तरह
पड़ा रहता है सारा दिन, सारी रात
वह फटी-फटी आँखों से
टुकुर-टुकुर ताकता रहता है सारा दिन, सारी रात
कोई भी सामने से आए-जाए
सत्य की सूनी निगाहों में जरा भी फ़र्क नहीं पड़ता
पथराई नज़रों से वह यों ही देखता रहेगा
सारा-सारा दिन, सारी-सारी रात

सत्य को लकवा मार गया है
गले से ऊपरवाली मशीनरी पूरी तरह बेकार हो गई है
सोचना बंद
समझना बंद
याद करना बंद
याद रखना बंद
दिमाग़ की रगों में ज़रा भी हरकत नहीं होती
सत्य को लकवा मार गया है
कौर अंदर डालकर जबड़ों को झटका देना पड़ता है
तब जाकर खाना गले के अंदर उतरता है
ऊपरवाली मशीनरी पूरी तरह बेकार हो गई है
सत्य को लकवा मार गया है

वह लंबे काठ की तरह पड़ा रहता है
सारा-सारा दिन, सारी-सारी रात
वह आपका हाथ थामे रहेगा देर तक
वह आपकी ओर देखता रहेगा देर तक
वह आपकी बातें सुनता रहेगा देर तक
लेकिन लगेगा नहीं कि उसने आपको पहचान लिया है

जी नहीं, सत्य आपको बिल्कुल नहीं पहचानेगा
पहचान की उसकी क्षमता हमेशा के लिए लुप्त हो चुकी है
जी हाँ, सत्य को लकवा मार गया है
उसे इमर्जेंसी का शाक लगा है
लगता है, अब वह किसी काम का न रहा
जी हाँ, सत्य अब पड़ा रहेगा
लोथ की तरह, स्पंदनशून्य मांसल देह की तरह!

[ रचनाकार: - बाबा नागार्जुन ]

January 21, 2010

" कालिदास, सच-सच बतलाना !" - बाबा नागार्जुन

" कालिदास, सच-सच बतलाना !"
इंदुमती के मृत्यु -शोक से
अज रोया या तुम रोए थे ?
कालिदास, सच-सच बतलाना!
शिवजी की तीसरी आँख से
निकली हुई महाज्वाला में
घृतमिश्रित सूखी समिधा सम
तुमने ही तो दृग धोए थे
कालिदास, सच-सच बतलाना !
रति रोई या तुम रोए थे?
वर्षा -ऋतु की स्निग्ध भूमिका
प्रथम दिवस आषाढ़ मास का
देख गगन में श्याम घनघटा
विधुर यक्ष का मन जब उचटा
चित्रकूट के सुभग शिखर पर
खड़े-खड़े तब हाथ जोड़कर
उस बेचारे ने भेजा था
जिनके ही द्वारा संदेशा,
उन पुष्करावर्त मेघों का
साथी बनकर उड़ने वाले
कालिदास, सच-सच बतलाना !
पर-पीड़ा से पूर-पूर हो
थक-थक कर औ ' चूर-चूर हो
अमल-धवलगिरि के शिखरों पर
प्रियवर तुम कब तक सोए थे ?
कालिदास, सच-सच बतलाना !
रोया यक्ष कि तुम रोए थे ?

[ रचनाकार: - बाबा नागार्जुन ]

January 13, 2010

"बरफ़ पड़ी है" - बाबा नागार्जुन

"बरफ़ पड़ी है"
बरफ़ पड़ी है
सर्वश्वेत पार्वती प्रकृति निस्तब्ध खड़ी है
सजे सजाए बंगले होंगे
सौ दो सौ चाहे दो एक हज़ार
बस मुठ्ठी भर लोगों द्वारा यह नगण्य शृंगार
देवदारूमय सहस बाहु चिर तरुण हिमाचल कर सकता है क्यों कर अंगीकार

चहल पहल का नाम नहीं है
बरफ़ बरफ़ है काम नहीं है
दप दप उजली साँप सरीखी सरल और बंकिम भंगी में -
चली गईं हैं दूर-दूर तक
नीचे ऊपर बहुत दूर तक
सूनी-सूनी सड़कें
मैं जिसमें ठहरा हूँ वह भी छोटा-सा बंगला है -
पिछवाड़े का कमरा जिसमें एक मात्र जंगला है
सुबह सुबह ही
मैंने इसको खोल लिया है
देख रहा हूँ बरफ़ पड़ रही कैसे
बरस रहे हैं आसमान से धुनी रूई के फाहे
या कि विमानों में भर भर कर यक्ष और किन्नर बरसाते
कास कुसुम अविराम

ढके जारहे देवदार की हरियाली को अरे दूधिया झाग
ठिठुर रहीं उंगलियाँ मुझे तो याद आ रही आग
गरम गरम ऊनी लिबास से लैस
देव देवियाँ देख रही होंगी अवश्य हिमपात
शीशामढ़ी खिड़कियों के नज़दीक बैठकर
सिमटे सिकुड़े नौकर चाकर चाय बनाते होंगे
ठंड कड़ी है
सर्वश्वेत पार्वती प्रकृति निस्तब्ध खड़ी है
बरफ़ पड़ी है

[ रचनाकार: - बाबा नागार्जुन ]

January 8, 2010

"कम्युनिज्म के पंडे" - बाबा नागार्जुन

"कम्युनिज्म के पंडे"
आ गये दिन एश के!
मार्क्स तेरी दाड़ी में जूं ने दिये होंगे अंडे
निकले हैं, उन्हीं में से कम्युनिज्म के चीनी पंडे
एक नहीं, दो नहीं तीन नहीं, बावन गंडे
लाल पान के गुलाम ढोयेंगे हंडे
सर्वहारा क्रांति की गैस के
आ गये अब तो दिन ऐश के
ठी-ठी-ठी
मचा रहे ऊधम बहोत
शांति के कपोत
पीले बिलौटे ने मार दिया पंजा
सर हुआ घायल लेनिन का गंजा
हंसता रहा लिउ शाओ ची
फी-फी-फी
[ रचनाकार: - बाबा नागार्जुन ]

January 4, 2010

" गुलाबी चूड़ियाँ" - बाबा नागार्जुन

"गुलाबी चूड़ियाँ"
प्राइवेट बस का ड्राइवर है तो क्या हुआ,
सात साल की बच्ची का पिता तो है!
सामने गियर से उपर
हुक से लटका रक्खी हैं
काँच की चार चूड़ियाँ गुलाबी
बस की रफ़्तार के मुताबिक
हिलती रहती हैं…
झुककर मैंने पूछ लिया
खा गया मानो झटका
अधेड़ उम्र का मुच्छड़ रोबीला चेहरा
आहिस्ते से बोला: हाँ सा’ब
लाख कहता हूँ नहीं मानती मुनिया
टाँगे हुए है कई दिनों से
अपनी अमानत
यहाँ अब्बा की नज़रों के सामने
मैं भी सोचता हूँ
क्या बिगाड़ती हैं चूड़ियाँ
किस ज़ुर्म पे हटा दूँ इनको यहाँ से?
और ड्राइवर ने एक नज़र मुझे देखा
और मैंने एक नज़र उसे देखा
छलक रहा था दूधिया वात्सल्य बड़ी-बड़ी आँखों में
तरलता हावी थी सीधे-साधे प्रश्न पर
और अब वे निगाहें फिर से हो गईं सड़क की ओर
और मैंने झुककर कहा –
हाँ भाई, मैं भी पिता हूँ
वो तो बस यूँ ही पूछ लिया आपसे
वर्ना किसे नहीं भाएँगी?
नन्हीं कलाइयों की गुलाबी चूड़ियाँ!

[ रचनाकार: - बाबा नागार्जुन ]

January 2, 2010

"इन घुच्ची आँखों में" - बाबा नागार्जुन

"इन घुच्ची आँखों में"
क्या नहीं है
इन घुच्ची आँखों में
इन शातिर निगाहों में
मुझे तो बहुत कुछ
प्रतिफलित लग रहा है!
नफरत की धधकती भट्टियाँ...
प्यार का अनूठा रसायन...
अपूर्व विक्षोभ...
जिज्ञासा की बाल-सुलभ ताजगी...
ठगे जाने की प्रायोगिक सिधाई...
प्रवंचितों के प्रति अथाह ममता...
क्या नहीं झलक रही
इन घुच्ची आँखों से?
हाय, हमें कोई बतलाए तो!
क्या नहीं है
इन घुच्ची आँखों में!
[ रचनाकार: - बाबा नागार्जुन ]

January 1, 2010

"चन्दू, मैंने सपना देखा" - बाबा नागार्जुन

"चन्दू, मैंने सपना देखा"
चन्दू, मैंने सपना देखा, उछल रहे तुम ज्यों हरनौटा
चन्दू, मैंने सपना देखा, भभुआ से हूं पटना लौटा
चन्दू, मैंने सपना देखा, तुम्हें खोजते बद्री बाबू
चन्दू, मैंने सपना देखा, खेल-कूद में हो बेकाबू
चन्दू, मैंने सपना देखा, कल परसों ही छूट रहे हो
चन्दू, मैंने सपना देखा, खूब पतंगें लूट रहे हो
चन्दू, मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मैं हूँ बाहर
चन्दू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कलेण्डर
चन्दू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कलेण्डर
चन्दू, मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मैं हूँ बाहर
चन्दू, मैंने सपना देखा, भभुआ से पटना आए हो
चन्दू, मैंने सपना देखा, मेरे लिए शहद लाए हो
चन्दू, मैंने सपना देखा, फैल गया है सुयश तुम्हारा
चन्दू, मैंने सपना देखा, तुम्हें जानता भारत सारा
चन्दू, मैंने सपना देखा, तुम तो बहुत बड़े डाक्टर हो
चन्दू, मैंने सपना देखा, अपनी ड्यूटी में तत्पर हो
चन्दू, मैंने सपना देखा, इम्तिहान में बैठे हो तुम
चन्दू, मैंने सपना देखा, पुलिस-वैन में बैठे हो तुम
चन्दू, मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मैं हूँ बाहर
चन्दू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कलेण्डर
[ रचनाकार: - बाबा नागार्जुन ]

December 31, 2009

"अण्डा" - बाबा नागार्जुन

"अण्डा"

पाँच पूत भारतमाता के, दुश्मन था खूंखार
गोली खाकर एक मर गया,बाकी रह गये चार

चार पूत भारतमाता के, चारों चतुर-प्रवीन
देश-निकाला मिला एक को, बाकी रह गये तीन

तीन पूत भारतमाता के, लड़ने लग गये वो
अलग हो गया उधर एक, अब बाकी बच गये दो

दो बेटे भारतमाता के, छोड़ पुरानी टेक
चिपक गया है एक गद्दी से, बाकी बच गया एक

एक पूत भारतमाता का, कन्धे पर है झन्डा
पुलिस पकड कर जेल ले गई, बाकी बच गया अंडा

[ रचनाकार: - बाबा नागार्जुन ]

December 30, 2009

"मंत्र" - बाबा नागार्जुन

पिछले कुछ दिनों में कुछ खास और बेहतरीन कवितायों को पढने का मौका मिला| पढने के बाद लगा की मेरे जैसे बहुतों को इन कविताओ के बारे में पता भी नहीं हैं| सो सोचा हैं कि अब कुछ वैसी कविताओ को भी यहाँ लिखू, ताकि मेरी तरह सबको परेशानी नहीं हो, उन्हें पाने में| शुरुआत बाबा नागार्जुन की कविता "मंत्र" से कर रहा हूँ| इस कविता को संजय झा ने आपनी फिल्म "स्ट्रिंग - बौंड ऑफ़ फैथ" में एक गीत के रूप में लिया हैं, जिसे जुबीन गर्ग ने गया हैं|

"मंत्र"

ब्द ही ब्रह्म है..
ब्द्, और ब्द, और ब्द, और ब्द
प्रण‌, ाद, मुद्रायें
क्तव्य‌, उदार्, घोषणाएं
ाष‌...
प्रव‌...
हुंकार, टकार्, शीत्कार
फुसफुस‌, फुत्कार, चीत्कार
आस्फाल‌, इंगित, इशारे
ारे, और ारे, और ारे, और ारे

कुछ, कुछ, कुछ
कुछ हीं, कुछ हीं, कुछ हीं
त्थ की दूब, रगोश के सींग
-तेल-ल्दी-जीरा-हींग
मूस की लेड़ी, नेर के ात
ाय की चीख‌, औघड़ की अट ात
कोय-इस्पात-पेट्रोल
मी ठोस‌, ाकी फूटे ढोल

इदान्नं, इम आपः इदज्य, इद विः
ान‌, पुरोहित, राज, विः
क्रांतिः क्रांतिः र्वग्व क्रांतिः
ांतिः ांतिः ांतिः र्वग्व ांतिः
भ्रांतिः भ्रांतिः भ्रांतिः र्वग्व भ्रांतिः
ाओ ाओ ाओ ाओ
ाओ ाओ ाओ ाओ
घेराओ घेराओ घेराओ घेराओ
निभाओ निभाओ निभाओ निभाओ

लों में एक अप ,
अंगीकरण, शुद्धीकरण, राष्ट्रीकरण
मुष्टीकरण, तुष्टिकरण‌, पुष्टीकरण
ऎतराज़‌, आक्षेप, अनुशास
द्दी आजन्म ज्रास
ट्रिब्यून‌, आश्वास
गुटनिरपेक्ष, त्तासापेक्ष जोड़‌-तोड़
‌-ंद‌, मिथ्य, होड़होड़
ास‌, उदाट
ारण मोह उच्चाट

ाली ाली ाली ाकाली ाकाली
ार ार ार ार ाय ाली
अपनी खुशाली
दुश्मनों की ामाली
ार, ार, ार, ार, ार, ार, ार
अपोजीश के मुंड ने तेरे ले ार
ऎं ह्रीं क्लीं हूं आङ
ायेंगे तिल और ाँधी की ाँग
बूढे़ की आँख, छोकरी ाज
तुलसीद, बिल्वत्र, न्द, रोली, अक्ष, ंगाज
शेर के ाँत, ालू के ाखून‌, र्क फोत
मेश मेश राज रेग मेरा पोत
छूः छूः फूः फूः फिट फुट
त्रुओं की ाती अर लोह कुट
भैरों, भैरों, भैरों, रंगली
ंदूक टोट, पिस्तौल की ली
डॉल, रूब, ाउंड
ाउंड, ाउंड, ाउंड


रती, रती, रती, व्योम‌, व्योम‌, व्योम‌, व्योम
अष्टातुओं के ईंटो के ट्टे
ामहिम, हमहो उल्लू के ट्ठे
दुर्ग, दुर्ग, दुर्ग, ारा, ारा, ारा
इसी पेट के अन्द ाय र्वारा
रिः त्स, रिः त्स

[रचनाकार: - बाबा नागार्जुन ; प्रकाशित वर्ष : - 1969]